| मांग की सिंदूर रेखा, तुमसे ये पूछेगी कल, |
| "यूँ मुझे सर पर सजाने का तुम्हें अधिकार क्या है ?" |
| तुम कहोगी "वो समर्पण, बचपना था" तो कहेगी, |
| "गर वो सब कुछ बचपना था, तो कहो फिर प्यार क्या है ?" |
| कल कोई अल्हड अयाना, बावरा झोंका पवन का, |
| जब तुम्हारे इंगितो पर, गंध भर देगा चमन में, |
| या कोई चंदा धरा का, रूप का मारा बेचारा, |
| कल्पना के तार से नक्षत्र जड़ देगा गगन पर, |
| तब किसी आशीष का आँचल मचल कर पूछ लेगा, |
| "यह नयन-विनिमय अगर है प्यार तो व्यापार क्या है ?" |
| कल तुम्हरे गंधवाही-केश, जब उड़ कर किसी की, |
| आखँ को उल्लास का आकाश कर देंगे कहीं पर, |
| और सांसों के मलयवाही-झकोरे मुझ सरीखे |
| नव-तरू को सावनी-वातास कर देगे वहीँ पर, |
| तब यही बिछुए, महावर, चूड़ियाँ, गजरे कहेंगे, |
| "इस अमर-सौभाग्य के श्रृंगार का आधार क्या है ?" |
| कल कोई दिनकर विजय का, सेहरा सर पर सजाये, |
| जब तुम्हारी सप्तवर्णी छाँह में सोने चलेगा, |
| या कोई हारा-थका व्याकुल सिपाही जब तुम्हारे, |
| वक्ष पर धर शीश लेकर हिचकियाँ रोने चलेगा, |
| तब किसी तन पर कसी दो बांह जुड़ कर पूछ लेगी, |
| "इस प्रणय जीवन समर में जीत क्या है हार क्या है ?" |
| मांग की सिंदूर रेखा, तुमसे ये पूछेगी कल, |
| "यूँ मुझे सर पर सजाने का तुम्हें अधिकार क्या है ?" |
0 Comments